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प्रभु उस आत्मा का वरण करते हैं जिसमें उन्हें प्राप्त करने की सच्ची जिज्ञासा हो : साध्वी वैष्णवी भारती
(Yogesh Gautam) Dainikkhabre.com Friday,29 November , 2019)

New Delhi  News,29 Nov 2019 (dainikkhabre.in) : दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा श्रीमद्भागवत कथा ज्ञानयज्ञ का भव्य आयोजन मयूर विहार, फेज-2, दिल्ली में किया जा रहा है। सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की शिष्या साध्वी सुश्री वैष्णवी भारती जी नेसप्तम् एवं अंतिम दिवस की सभा में बहुत ही सुसज्जित ढंग से भगवान श्रीकृष्ण जी के अलौकिक एवं महान व्यक्तित्व के पहलुओं से अवगत करवाया। रूक्मिणी विवाह प्रसंग के माध्यम से सीख मिलती है कि प्रभु उस आत्मा का वरण करते हैं जिसमें उन्हें प्राप्त करने की सच्ची जिज्ञासा हो। रूकिमणी जी ने हमारे समक्ष आदर्श नारी का चरित्र प्रस्तुत किया। शिशुपाल के पास ऐश्वर्य, वैभव का अभाव नहीं था। फिर भी द्वारिकानाथ को ही वर रूप में स्वीकार किया। चुनाव के समय में भी उन के सामने शिशुपाल एवं श्री कृष्ण में से भगवान का ही चुनाव किया। हमें समझना होगा नारी पद अत्यंत गरिमापूर्ण है। परंतु स्वतंत्रता के नाम पर नारी पाश्चात्य का अंधानुकरण कर रही है। अपनी गरिमा को भूल कर एक्टिंग जैसे व्यवसायों का चुनाव कर रही है। जहां सादगी, पवित्रता के भूषण उससे छीन लिये जाते हैं। एक भोग्या के रूप में उसे प्रस्तुत किया जाता है। बाजार में बिकने वाले कैलेंड़र, पत्रा-पत्रिकाओं में नारी के जिस रूप को दिखाया जाता है। उसके पीछे एक कुत्सा अट्टाहस करती प्रतीत होती है कि नारी के जीवन का कोई ओर अंश देखने योग्य नहीं। भारत की नारी अपनी योग्यता, कुशाग्रता से हर क्षेत्रा में आगे बढ़ रही है। उसे दूषित कर पवित्रता के पथ से विचलित करने का षडयंत्र हो रहा है। नारी इससे अनभिज्ञ है। स्मरण रहें भारत में नारी का वर्चस्व महान रहा है। अपाला, गोध, विश्वारा, रोमशा, सूर्या, सावित्री` इन वैदिक नारियों ने अपनी महानता से भारत का नाम रौशन किया। नारी को आत्मिक ज्ञान की परिपाटी की ओर जाना होगा। पन्नाधय, मदालसा, लक्ष्मीबाई जैसी वीरांगनाओं के पदचिन्हों का अनुसरण करें।

राजसूय यज्ञ द्वारा प्रभु श्री कृष्ण जी के अग्रपूजन में शिशुपाल व्यवधान उत्पन्न करता है। शिशुपाल प्रभु के विषय में अर्नगल प्रलाप बोलता है। उस के सौ अपराध क्षमा कर प्रभु ने सुदर्शन चक्र से उस का उध्दार किया। साध्वी जी ने भगवान एवं उनके सखा सुदामा की कथा को बांचा। सुदामा प्रभु के मित्र होने के साथ उनके अनन्य भक्त भी रहे। दोनों की मित्रता संदीपनी मुनि के आश्रम से प्रारंभ हुई। सुदामा प्रभु से भेंट करने द्वारिका जाते हैं। वहां दोनों की मित्रता की परिपक्वता को सबने देखा। सुदामा के तन पर नाममात्रा धोती है तो द्वारिकानाथ भी विशेष परिधनों से सुसज्जित हो कर नहीं आये। सुदामा ने पांव में पादुका नहीं पहनी, सिर पर पगड़ी नहीं है। प्रभु ने भी मुकुट नहीं पहना, नंगे चरण लिये सुदामा से मिलने चले आये। भगवान ने समझाया कि भक्त मुझे जिस भाव से भजेगा, मैं भी उसके उसी भाव को ग्रहण करूंगा। सुदामा ने कन्हैया से कुछ नहीं मांगा परंतु प्रभु ने उन्हें त्रिलोकी का वैभव प्रदान किया। कथा का समापन भागवत पूजन से किया गया।                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                             

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